5 + Motivational Story in Hindi for Kids / बच्चों की प्रेरणादायक हिंदी कहानी

5 + Motivational Story in Hindi for Kids / बच्चों की प्रेरणादायक हिंदी कहानी

Motivational Story in Hindi for Kids मित्रों इस पोस्ट में Motivational Story in Hindi for Kids Writing की कहानी दी गयी है।  आप यह कहानी जरूर पढ़ें।  यह बहुत ही शिक्षाप्रद हिंदी कहानी है।

 

 

 

 

Motivational Story in Hindi for Kids ( प्रेरणादायक हिंदी कहानी ) 

 

 

 

 

 

 

एक गांव था गोपालपुर।  उस गाँव में एक बहुत बड़ा तालाब था। वह तालाब उस गांव  का जीवन था। गांव के वासी उसी तालाब का पानी पीते थे।

 

 

 

 

पीने का पानी  होने के कारण उस तालाब और उसके आसपास की सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। तालाब के किनारे नहाना व कपड़े धोना मना था।

 

 

 

उसी तालाब में पानी के कई तरह के जीव भी रहते थे। मछली ( Fish ) , कछवे यहां तक कि सांप भी रहते थे। उन्हीं में से एक केकड़ा भी था जो बहुत ही समझदार था। पानी के जीवों पर जब भी कोई संकट आता तब वे केकड़े की ही मदद लेते थे।

 

 

 

 

उसी तालाब के पास एक बगुला भी रहता था जो प्रतिदिन उस तालाब में आकर पानी के जीवों को खाकर अपना पेट भरता था। इसी तरह कई साल बीत गए। गांव की आबादी भी बढ़ गई। अब उस तालाब का पानी पूरा नहीं पड़ता था, इसलिए राजा ने गांव में कुछ कुएं खुदवा दिए।

 

 

 

 

अब सभी लोग वहीं से पानी लेते थे। तालाब के जीव खुश थे कि लोग इस तरफ  अब कम ही आते थे, लेकिन उस बगुले से वे तब भी परेशान थे। उधर बगुला ( Heron ) भी अब बूढ़ा हो गया था।

 

 

 

 

 

अब उसे अपना शिकार पकड़ने में काफी कठिनाई होती  थी। वह सोचने लगा कि यदि इसी तरह चलता रहा तो भूखों मरने की नौबत  आ  जाएगी। वह कोई ऐसी तरकीब सोचने लगा कि पानी के जीव स्वयं ही उसके  चंगुल में फंस जाएं।

 

 

 

 

काफी सोचने के बाद उसे एक तरकीब सूझी और वह तालाब के किनारे जाकर  रोने लगा। उसे रोते देख तालाब के जीव कुछ परेशान हो गए, किंतु केकडे ( Crab ) को इसमें भी बगुले की मक्कारी नजर आ रही थी।

 

 

 

 

जब पानी के जीवों ने देखा कि काफी देर बाद भी बगुले का रोना बंद नहीं हुआ तब उन्होंने केकड़े से इसका कारण पता लगाने के लिए कहा।

 

 

 

 

अपने साथियों के कहने पर केकड़ा पानी से बाहर आया और बगुले से बोला, “बगुला भाई! क्या बात है, परेशान क्यों हो?” “केकड़े भाई! मैंने जिंदगीभर तुम लोगों पर अत्याचार किए हैं, किंतु अब मुझे प्रायश्चित्त करने का मौका मिला है जिसे मैं गंवाना नहीं चाहता।” बगुले ने रोते हुए कहा।

 

 

 

 

“बात तो ठीक है बगुले भाई! पर हुआ क्या है?” केकड़े ने आश्चर्य से पूछा। “केकड़े भाई! अब तुमसे क्या छिपाना, तुम तो जानते ही हो कि इस गांव में अब पानी की कोई कमी नहीं है।

 

 

 

 

राजा ने कुएं खुदवा दिए हैं, इसलिए गांव वाले इस तालाब को मिट्टी डालकर भरवा रहे हैं, मैं यही सोचकर दुखी हूं कि अब तुम लोगों का क्या होगा।”

 

 

 

 

कुछ देर रोनी सूरत बनाए रखने के बाद बगुला पुनः बोला, “मैंने सोचा है कि तुम लोगों की जान बचाकर मैं अपने पापों का प्रायश्चित्त करू।”

 

 

 

 

“पर तुम हमारी जान कैसे बचाओगे और फिर हम लोग तुम पर विश्वास ही  क्यों करें?” केकडे ने कहा। “मैं जानता हूं कि तुम लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं होगा। पर यकान मानो मैं सच कह रहा हूं।” बगुले ने विश्वास दिलाते हुए कहा।

 

 

 

 

“ठीक है, तुम्हारी बात पर विश्वास कर लेते हैं. किंत अब यह बताओ कि हमारी  जान कैसे बचाओगे?” केकडे ने पूछा।

 

 

 

 

“केकड़े भाई! इस गांव से कुछ ही दूरी पर एक दूसरा गांव है। वहां इससे भी बड़ा  तालाब है। में एक-एक करक तुम लोगों को उस तालाब तक ले जाऊंगा। यही मेरा प्रायश्चित्त होगा।”

 

 

 

 

केकड़े समझदार था। उसे पूर्ण विश्वास था कि बगुला जरूर कोई चाल चल रहा है ,अतः  उसने बगुले से कहा कि वह पहले अपने अन्य साथियों से सलाह लेगा. फिर इस बारे में फैसला किया जाएगा।

 

 

 

 

बगुला मन-ही-मन खुश हो रहा था। वह तो चाहता ही यही था कि एक-एक जीव को दूसरे तालाब में ले जाने के बहाने यहां से ले जाए और उन्हें मारकर खा ले।  उसे इस बात का भी यकीन था कि अन्य जीव भी दूसरे तालाब पर जाने के लिए राजी हो जाएंगे।

 

 

 

 

उधर केकडे ने तालाब में जाकर सभी साथियों को बगुले की बात बताई। केकडे की तरह ही अन्य जीवों को भी बगुले की बात पर सहज ही विश्वास नहीं हो रहा था। उन्होंने फैसला केकड़े पर छोड़ दिया। तब केकड़े ने तय किया कि वह बगुले के साथ जाकर देखेगा कि वास्तविकता क्या है।

 

 

 

 

केकड़ा पुनः तालाब से बाहर आया और बगुले से बोला, “हम सभी ने तय किया है कि तुम्हारे साथ नए तालाब में जाएंगे और सबसे पहले मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”

 

 

 

यह सुनकर बगुले के चेहरे पर कुटिल मुस्कान उभर आई। उसे अपनी चाल सफल  होती नजर आने लगी। उसने केकड़े को अपनी पीठ पर बैठा लिया और चल पड़ा।

 

 

 

 

कुछ  दूर तक चलने के बाद बगुला केकड़े से बोला, “केकडे भाई तुम तो जानते ही  हो कि मैं बूढा हो चुका हूं, इसलिए अधिक देर तक बोझ उठाकर नहीं चल सकता।  कुछ देर के लिए मेरी पीठ से उतर जाओ। थोड़ा आराम कर लें, फिर आगे बढ़ेंगे।”

 

 

 

 

 

केकडा पूरी तरह सतर्क था। उसे पहले से ही अंदेशा था कि बगुला कोई  चाल चल  सकता है। केकड़े के पीठ से उतरते ही बगुला बोला, “मूर्ख केकडे! अब तू   मेरे जाल में फंस चुका है, तुझे खाकर मैं अपना पेट भरूंगा। आखिरी बार अपने   भगवान को याद कर ले।”

 

 

 

 

केकड़ा तो पहले ही सतर्क था कि ऐसा कुछ भी हो सकता है। इसलिए वह  घबराया नहीं और हिम्मत करता हुआ बोला, “बगुले भाई! अगर भगवान को यही मंजूर है कि मैं तुम्हारा आहार बनूं तो क्या किया जा सकता है, किंतु तमसे एक विनती है…आज्ञा दो तो कहूं।”

 

 

 

 

 

“चलो तुम्हारी आखिरी इच्छा भी मान लेते हैं, बोलो क्या बात है?” बगुले ने पूछा।

 

 

 

 

“बगुले भाई! मैं चाहता हूं कि मरने से पहले मैं आंखें बंद करके अपने भगवान को याद कर लूं और कुछ पल तुम भी आंखें बंद करके मेरा साथ दो।” केकड़े ने बचाव के लिए अपना पासा फेंका।

 

 

 

 

बगुले ने सोचा कि अब तो यह बच नहीं सकता, सो इसकी बात मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। उसने भी आंखें बंद कर लीं। केकड़ा तो इसी ताक में था।

 

 

 

 

 

जैसे ही बगुले ने आंखें बंद की, केकड़ा कूदकर बगुले की गरदन पर चढ़ गया और अपने दोनों डंक उसकी गरदन में घुसा दिए। बगुला कुछ पल में तड़पकर ढेर हो  गया।

 

 

 

 

इस तरह छोटे-से केकड़े ने अपनी समझदारी से न केवल अपनी जान बचाई, बल्कि तालाब के अन्य जीवों का जीवन भी सुरक्षित कर लिया।

 

 

 

 

 

Moral Of This Story – संस्कारों का प्रभाव अत्यंत तीव्र होता है। बगुला स्वभाव से ही कुटिल होता  है। भगत बनना उसके लिए संभव ही नहीं। कुटिलता का अंत करने के लिए कुटिलता  का सहारा लेने में कोई बुराई नहीं. जैसा उस चतुर केकड़े ने किया।

 

 

 

संघर्ष का महत्व क्या है Hindi Motivational Stories For Kids

 

 

 

Motivational Story in Hindi for Kids
Motivational Story in Hindi for Kids

 

 

 

2- जिस प्रकार नदी अपने प्रवाह में अनेको पत्थरो को बहाकर लाती है। जो पत्थर नदी के प्रवाह में निरंतर बहते रहते है और अपने ऊपर अनेको कष्ट को सहते है। वह पत्थर घिसते हुए एक सुंदर स्वरूप में बदल जाते है। जिन्हे प्रत्येक मनुष्य पसंद करता है और जो दूसरे पत्थर नदी के प्रवाह को झेलते हुए किनारे लग जाते है और फिर कभी नदी के प्रवाह में जाने की कोशिश ही नहीं करते और उनका स्वरूप भी बेडौल रहता है।

 

 

 

 

कोई भी उन बेडौल पत्थरो को पसंद नहीं करता जबकि उसी नदी से निकले हुए खूबसूरत पत्थरो की अधिक कीमत लगती है और बेडौल पड़े पत्थरो पर लोग पैर रखकर आते-जाते है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी है जो जितना ज्यादा संघर्ष शील होता है। वह एक दिन शीर्ष पर होता है। लेकिन जो संघर्ष करने से डरता है वह तो उस पत्थर की तरह हो जाता है जिसपर लोग पांव रखकर आते-जाते है।

 

 

 

 

रामू और नीरज दो छोटे बच्चे थे। दोनों साथ ही खेलते थे और साथ ही पढ़ते थे। दोनों बहुत बड़े सपने देखते थे। रामू का सपना था कि मैं पढ़-लिखकर मास्टर बनूंगा फिर अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए एक बड़े स्कूल का प्रिंसिपल बनूंगा फिर आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए कुलपति बनूंगा फिर कुलाधिपति बनने के बाद ही विश्राम करूँगा।

 

 

 

 

 

लेकिन नीरज का सपना था कि वह अपने पिता के बनाए हुए व्यापार को ही आगे बढ़ाएगा। समय बीतता गया। नीरज ने बारहवीं तक पढ़कर अपने पिता के बनाए हुए व्यापार को आगे बढ़ाने में जुट गया था और संतुष्ट था।

 

 

 

 

लेकिन रामू अपने सपनो को पूरा करने के लिए दिन रात किताबी कीड़ा बन गया था। पढ़ाई के समय में उसके सामने बहुत ही कठिनाई आ गई थी।

 

 

 

 

अन्य लोग उसे हतोत्साहित करने में लगे रहते थे। यहां तक कि रामू के खुद अपनों ने भी कहना शुरू कर दिया था। तुम पढ़ाई में जितना समय गवां रहे हो उतने समय में तो अच्छा खासा पैसे कमा सकते हो।

 

 

 

 

लेकिन रामू ने हार नहीं मानी वह M. A. की पढ़ाई पूरी करके मास्टर बन गया था। उसके बाद भी अपनी पढ़ाई को जारी रखे हुए था।

 

 

 

 

समय बीतने के साथ ही वह एक दूसरे स्कूल में प्रिंसिपल के पद पर आसीन हो गया था। कई लोगो ने रामू से कहा भी तुम अब तोअच्छे खासे कमा रहे हो तुम्हारी इज्जत भी बढ़ गई है।

 

 

 

 

लेकिन रामू का एक ध्येय था ‘राम काज कीन्हे बिना मोहि कहां विश्राम‘ कुलाधिपति बनना। रामू अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अपने संघर्ष को जारी रखे हुए था।

 

 

 

 

समय की परीक्षा में पास होकर एक नामी विश्वविद्यालय का कुलपति बन गया था। लेकिन अपने ध्येय में सफल होने के लिए जीवन की नदी के बीच प्रवाह में चलने के लिए तैयार था।

 

 

 

 

उधर नीरज अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटा कर ही संतुष्ट था। सो वह छोटे से व्यापार में ही संकुचित हो गया था। लेकिन रामू तो जीवन की नदी के प्रवाह में बहता ही रहा।

 

 

 

 

एक दिन उसका मूल्य उसे प्राप्त हो गया था। अब रामू कुलपति से कुलाधिपति बन ही गया। वह उस नदी के प्रवाह के साथ थपेड़े खाते हुए उस पत्थर की भांति हो गया था जिसका बहुत मूल्य था।

 

 

 

किस्मत मौका देती है, मेहनत चौंका देती है Best Motivational Story in Hindi for Kids

 

 

 

3- मनुष्य के जीवन में एक बार अच्छा मौका जरूर आता है। लेकिन मनुष्य के जीवन में मेहनत की अहमियत भी कम नहीं होती। अगर मेहनत और किस्मत का साथ अगर जिसे भी मिल जाय तो उसे सफल होने में देर नहीं लगती है। मेहनत और किस्मत दोनों एक सिक्के के दो पहलू है और दोनों की ही जीवन में आवश्यकता होती है।

 

 

 

 

जिस तरह सिक्के में एक तरफ अगर रुपया का चिन्ह न बना हो तब उस रुपये की एक पैसे के बराबर भी कीमत नहीं होती है। अगर रुपये का चिन्ह बना है लेकिन सरकार का चिन्ह नहीं बना हो तब भी उस सिक्के की एक पैसा भी कीमत नहीं होगी। इसी तरह मनुष्य के जीवन में मेहनत और किस्मत का साथ अनिवार्य होता है। दोनों के साथ मिलने पर सफलता अवश्य मिलती है।

 

 

 

 

मोहन एक गरीब घर का लड़का था। वह नौकरी की तलाश में एक बार शहर गया हुआ था। मोहन एक कंपनी में काम के लिए गया।

 

 

 

तब उस कंपनी के मालिक ने कहा, “तुम हमारे ऑफिस का फर्स साफ कर सकते हो ?”

 

 

 

 

मोहन ने कंपनी के मालिक से कहा, “हां, मैं आपकी ऑफिस का फर्स साफ कर सकता हूँ।”

 

 

 

 

कंपनी के मालिक ने मोहन से अपने ऑफिस का फर्स साफ करने के लिए कह दिया था। मोहन अब मेहनत से मालिक के ऑफिस का फर्स साफ करके चमका दिया था।

 

 

 

 

कंपनी के मालिक ने मोहन से कहा, “मैं तुम्हारे काम से बहुत खुश हूँ। तुम कल से काम पर आ जाना। लेकिन अपने साथ एक पहचान पत्र अवश्य ही लेते आना।”

 

 

 

 

मोहन कंपनी  के मालिक से बोला, “सेठ हमारी मेहनत ही हमारी पहचान है। मैं गरीब घर का लड़का हूँ, पहचान पत्र कहां से लाऊंगा।”

 

 

 

 

कंपनी का मालिक बोला, “यहां पर सभी लोगो का पहचान पत्र है। अगर तुम अपना पहचान पत्र नहीं लाओगे तो मुझे दुःख के साथ कहना पड़ रहा है। कि मैं तुम्हे काम नहीं दे पाऊंगा।”

 

 

 

 

कंपनी के मालिक की इतनी बात सुनकर मोहन जैसे आसमान से नीचे गिर पड़ा। वह निराश होकर जाने लगा। मोहन एक बाजार में पहुँच गया था।

 

 

 

 

बाजार में एक जगह कई लोगो की भीड़ लगी हुई थी। मोहन ने नजदीक से जाकर देखा तो उसे मालूम हुआ कि यह भीड़ सब्जी खरीदने के लिए लगी हुई थी।

 

 

 

 

मोहन के मन में एक विचार ने जन्म लिया। मोहन के पास 500 रुपये पड़े हुए थे। उसने 500 रुपये से आलू खरीदा और बेचना चालू किया।

 

 

 

 

मोहन का सारा आलू एक घंटे में ही बिक गया था। अब मोहन उत्साह से परिपूर्ण था। उसने दूसरी बार एक हजार का आलू खरीदकर तीन घंटे में ही बेच डाला।

 

 

 

 

फिर तीसरी बार 1500 रुपये का आलू खरीदा और उसे भी बेच डाला। मोहन अपने घर आ गया था। अब उसके पास काफी पैसे जमा हो गए थे और उसका उत्साह तो देखने लायक था।

 

 

 

 

मोहन की मेहनत और किस्मत दोनों ही साथ दे रही थी। अब मोहन बहुत बड़ा आलू का होलसेलर बन गया था। उसके पास जीवन की सारी सुविधाए मौजूद थी और जीवन की सारी समस्याए गायब थी।

 

 

 

 

सबसे बड़ी बात यह कि मोहन ने अपने पास 50 लोगो को रोजगार दिया हुआ था। एक दिन मोहन के पास एक इन्सुरेंस कंपनी का कर्मचारी आया और मोहन को बीमा करवाने के लिए कहा।

 

 

 

 

इन्सुरेंस कंपनी  का कर्मचारी मोहन से आईडी (पहचान पत्र) मांगने लगा। मोहन उस कर्मचारी से भी वही बात कह दिया जो अपने काम के शुरुवात में कंपनी मालिक से कह चुका था।

 

 

 

 

मोहन उस इन्सुरेंस कर्मचारी से कहा, “हमारे पास तो हमारी मेहनत पहचान है।”

 

 

 

इन्सुरेंस कर्मचारी बोला, “अगर आपके पास आईडी होता तब आपका व्यापर बहुत ही आगे निकल जाता।”

 

 

 

 

मोहन उस कर्मचारी से कहने लगा, “दोस्त अगर हमारे पास आईडी होता तब तुम हमसे मुलाकात ही नहीं कर सकते थे।”

 

 

 

 

कर्मचारी बोला, “क्यों, हम आपसे मुलाकात नहीं कर पाते ?”

 

 

 

 

मोहन का एकदम छोटा सा उत्तर था। तब मैं एक कंपनी में काम करने वाला ही रह जाता। मैं इस बुलंदी तक कभी नहीं पहुँच पाता था।

 

 

 

अभ्यास गुरु 

 

 

Motivational Story in Hindi for Kids
Motivational Story in Hindi for Kids

 

 

 

4- Top Motivational Stories in Hindi For Kids – मनुष्य के जीवन में गुरु का अप्रतिम स्थान होता है। मनुष्य जब बालक रूप में रहता है तब उसकी प्रथम गुरु ‘माँ’ होती है। उसके बाद ही अन्य गुरुओ का नंबर आता है। लेकिन मनुष्य हो या छोटा सा बालक उसका तो सबसे बड़ा गुरु होता है ‘अभ्यास’ । गुरु थोड़ा सहारा देता है लेकिन अभ्यास गुरु बालक या मनुष्य को किसी भी कार्य में पारंगत बना देता है।

 

 

 

 

माता अपने छोटे से बालक को थोड़ा सहारा देकर खड़ा करती है लेकिन वह बालक गिर जाता है। लेकिन उसका अभ्यास गुरु उसे खड़ा होने में पारंगत बना देता है। उसी प्रकार मनुष्य अपने विद्यार्थी जीवन में या जीविकोपार्जन में गुरु का सहारा अवश्य लेता है। लेकिन उसे सफलता अभ्यास गुरु से ही मिलती है।

 

 

 

 

बंटी जब छोटा था तो सपेरे को बीन बजाते हुए देखता तो अपने मन में सोचता था यह सपेरा कितना बढ़िया बीन बजाता है। बंटी के मन में भी बीन बजाने की इच्छा प्रबल हो गई थी।

 

 

 

 

किशोर अवस्था तक पहुंचते ही बंटी ने उस सपेरे को ढूंढ निकाला और उससे बांसुरी सीखने की इच्छा प्रकट किया। सपेरे ने बंटी को अपने एक मित्र के पास भेज दिया जो बांसुरी बजाने में महारथ हासिल कर चुका था।

 

 

 

 

बंटी बांसुरी सीखने की गरज से उस आदमी के पास गया जिसे सभी लोग चौधरी चाचा के नाम से जानते थे। चौधरी चाचा के पास कई सारे शिष्य थे जो बांसुरी सीखते थे।

 

 

 

 

चौधरी चाचा अपने रवि नाम के शिष्य को बड़ी ही तन्मयता से बांसुरी की सब बारीकियां सिखाते थे इसलिए उन्होंने बंटी के ऊपर कम ध्यान दिया।

 

 

 

 

एक दिन चौधरी चाचा ने बंटी से नाराज होकर अपने यहां से निकाल दिया था। लेकिन जाते-जाते बंटी को एक रोशनी तो मिल ही गई थी कि वह बांसुरी को बजा सकता था।

 

 

 

 

अब यही से अभ्यास गुरु का खेल शुरू होता है। बंटी ने एक फोटो ‘शारदा माता’ का खरीदा और उस फोटो को अपने साथ लेकर एक घने बगीचे में जाकर प्रतिदिन सुबह और शाम बांसुरी बजाने का अभ्यास करने लगा।

 

 

 

 

बगीचे से होकर गुजरने वाले राहगीर बंटी की बांसुरी सुनकर कुछ पल जरूर ठहर जाते थे। राहगीरों को कुछ पल के लिए अपनी सारी समस्याए तुच्छ लगने लगती थी।

 

 

 

 

अभ्यास करते हुए बंटी ने खुद की धुन बना डाली जो किसी के पास ही नहीं थी। एक दिन एक सर्कश चलाने वाला मालिक उस बगीचे की राह से जा रहा था।

 

 

 

 

उसने बंटी  की बांसुरी की आवाज सुना और कुछ राहगीरों के साथ ही वह भी रुक गया। बंटी की बांसुरी से  सुरीली ‘धुन’ निकल रही थी कि वहां रुके हुए सभी राहगीरों के साथ वह सर्कश का मालिक भी बेचैन हो गया।

 

 

 

 

सर्कश के मालिक ने राहगीरों से उस बांसुरी वाले का पता पूछा तो सभी ने अनभिज्ञता जाहिर किया और सभी राहगीर बोले, “हम लोग तो रोज ही यह कर्ण प्रिय बांसुरी की धुन का रसास्वादन करते है।”

 

 

 

 

अब सर्कश के मालिक ने दो चार राहगीरों को साथ लेकर उस घने बगीचे के अंदर गया। वहां बंटी अपनी बांसुरी बजाने में इतना तल्लीन था कि उसे किसी के आने की भनक तक नहीं लग पाई।

 

 

 

 

कुछ देर बाद ही बंटी ने बांसुरी बजाना बंद किया तब अपने सामने चार-पांच लोगो को देखकर चौक गया क्योंकि आज तक कोई भी उसके पास तक नहीं पहुँच पाया था।

 

 

 

 

बंटी ने उन आगुन्तको के आने का कारण पूछा तो सबसे पहले सर्कश का मालिक ही बोल पड़ा, “महानुभाव, हमे आपकी बांसुरी की आवाज ने यहां आने पर विवश कर दिया है क्योंकि आप बांसुरी बहुत अच्छी तरह बजाते हो।”

 

 

 

 

सर्कश के मालिक ने बिना किसी लाग लपेट के कहा, “महाशय, क्या आप हमारे साथ काम करना चाहेंगे क्योंकि मैं एक सर्कश कंपनी का मालिक हूँ हमे आप जैसे सुयोग्य लोगो की ही आवश्यकता है ?”

 

 

 

 

लेकिन …… बंटी की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी। सर्कश का मालिक बोल पड़ा, “आप पैसे की बात मत करिए। आप जो भी और जितना भी कहोगे मैं देने के लिए तैयार हूँ। आप अभी और तुरंत हमारे साथ चलिए।”

 

 

 

 

वह सर्कश का मालिक बंटी को लेकर चला गया क्योंकि उसे सर्कश चालू करने का समय हो चुका था। सर्कश चालू हो गया था। उसे देखने के लिए चौधरी चाचा अपने सभी शिष्यों के साथ आए हुए थे। उसमे उनका प्रिय शिष्य रवि भी था।

 

 

 

 

सर्कश के आरंभ में ही बंटी की बांसुरी की तान गूंज उठी थी। सभी दर्शको ने उस तान को सुनकर ही समझ लिया कि उनका पैसा वसूल हो गया है। चौधरी चाचा तो एकदम से मंत्रमुग्ध हो गए थे।

 

 

 

 

अब जो भी दर्शक एक बार सर्कश देखकर जाता था दूसरे दिन फिर बांसुरी की धुन सुनने के लिए ही आता था। यह बात पूरे शहर में फ़ैल गई थी।

 

 

 

 

लोग तीन दिन पहले ही सर्कश का टिकट लेकर बैठ जाते थे। उसके बाद सर्कश में तिल रखने की जगह नहीं थी। दर्शको की मांग पर पूरा का पूरा शो बंटी की बांसुरी सुनने के लिए ही रखा गया था।

 

 

 

 

 

एक दिन चौधरी चाचा ने सर्कश मालिक से उस बांसुरी वादक से मिलने की प्रार्थना किया। सर्कश का मालिक बंटी का बहुत विशेष ख्याल रखता था।

 

 

 

 

लेकिन बहुत बिनती के बाद ही चौधरी चाचा को बंटी से मिलवाया। बंटी से मिलने के बाद चैधरी चाचा तो उसे नहीं पहचान सके लेकिन बंटी ने उन्हें पहचान लिया और अपने गुरु की खूब आवभगत किया फिर पूछा, “आपने हमे पहचाना कि नहीं गुरुदेव ?”

 

 

 

 

 

चौधरी चाचा बोले, “मैं आपको नहीं पहचान पा रहा हूँ। मैं तो आपकी बांसुरी सुनकर बहुत उत्कंठा से मिलने आपके पास चला आया हूँ।”

 

 

 

 

बंटी ने चौधरी चाचा से कहा, “मैं आपका वही शिष्य हूँ। जिसे आपने नाराज होकर बांसुरी सिखाने से मना कर दिया था। लेकिन आपने हमे एक राह तो अवश्य ही दिखा दिया था। जिसपर चलकर अभ्यास गुरु के सहारे मैं यहां तक आ गया हूँ।”

 

 

 

लकीर का फकीर नहीं बनना चाहिए 

 

 

 

5- Latest Motivational Story in Hindi For Kids – किसी भी मनुष्य को अपना रास्ता या अपना कैरियर खुद बनाना चाहिए जो दूसरो से हटकर हो न कि दूसरो के बनाये हुए रास्ते को चुनना चाहिए। दुनिया में जितने भी महान से महानतम व्यक्ति हुए है। उन्होंने अपना मार्ग स्वयं ही तैयार किया था न कि अन्य के बनाए हुए मार्ग का अनुसरण किया था। चाहे वह भक्ति साधना का मार्ग हो या विज्ञान साधना का मार्ग हो।

 

 

 

 

 

आज दुनिया उनके बनाए हुए मार्ग पर चल रही है इसलिए तो वह महान व्यक्ति थे। अपना मार्ग निर्धारण करने में कठिनाइया अवश्य ही आती है। लेकिन इससे दूसरो का मार्ग सरल और सहज हो जाता है। अगर आप लकीर के फकीर बनेंगे तो आप भी उसी भीड़ में खो जाएंगे जिसमे अन्य लोग भी उस भीड़ का हिस्सा बन गए है। अगर आपकी राह अन्य लोगो से अलग रहेगी तो आप उस नक्षत्र के समान होंगे जो सदा ही प्रज्वलित होकर चमकता रहता है।

 

 

 

 

 

एक गांव था जो अपने अगल-बगल घने पेड़ो से आच्छादित था। दूर से देखने पर घना जंगल प्रतीत होता था। उस गांव में कई तरह के लोग रहते थे।

 

 

 

 

उस गांव के लोगो का शहर से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। उसी गांव में एक भेड़ चराने वाला गड़ेरिया रहता था। एक दिन वह गांव के लोगो से कहने लगा, “मैं अपनी भेंड़ बेचकर शहर जाऊंगा क्योंकि वहां हर तरह की सुविधा मौजूद है।”

 

 

 

 

सभी लोग उसे समझाने का प्रयास करने लगे। लेकिन एक दिन उस गड़ेरिया ने अपनी सभी भेंड़ो को बेच दिया और दूसरे दिन शहर के लिए प्रस्थान कर गया।

 

 

 

 

काफी दिन बीत गए थे। गड़ेरिया को न वापस आना था न ही आया। अब एक दिन एक धोबी अपना गधा लेकर उस रास्ते से शहर की तरफ चला गया और वापस नहीं लौटा।

 

 

 

 

गड़ेरिया और धोबी को नहीं लौटते देखकर गांव के अन्य लोग भी सोचने लगे कि शहर में अवश्य ही सारी सुविधाए मौजूद होंगी, तभी तो वह दोनों वापस नहीं लौटकर आए।

 

 

 

 

अब तो प्रमोद रामू और सोनू इत्यादि युवक भी उस गड़ेरिया के बनाए हुए रास्ते से शहर के लिए जाने को तैयार थे क्योंकि कई लोगो के आने जाने से एक पतला सा रास्ता बन गया था।

 

 

 

 

 

लेकिन उस गांव में एक विजय नाम का लड़का रहता था उसने भी शहर जाने की ठान रखी थी लेकिन उसकी जिद थी कि मैं अपना रास्ता खुद ही बनाऊंगा और अन्य लोग उसपर चलेंगे जो गड़ेरिया के द्वारा बनाए गए रास्ते से बहुत ही सुगम और सुरक्षित होगा क्योंकि गड़ेरिया के द्वारा बनाया गया रास्ता बेहद दुर्गम और लंबा था।

 

 

 

 

 

उस रास्ते से जाने में समय भी अधिक लगता था। विजय एक दिन सुबह अपने गांव से शहर की ओर चल दिया। उसने ऐसा रास्ता चुना था जो सुगम भी था और सुरक्षित भी क्योंकि गांव के अन्य लोग अपने गांव से बाहर निकलते ही नहीं थे।

 

 

 

 

उन्हें वह छोटा सा गांव ही दुनिया प्रतीत होता था। विजय थोड़ा पढ़ा लिखा नौजवान था। वह शहर पहुंचकर अपने गांव के लिए कुछ करना चाहता था।

 

 

 

 

विजय ने शहर के बड़े अधिकारियो से मिलकर अपने गांव के विषय में बताया। एक हप्ते के अंदर ही शहर के अधिकारियो ने उस गांव में पहुंचकर सर्वे कराया और दूसरे दिन इंजीनियर की टीम गांव से शहर को जोड़ने के लिए सड़क बनाने आ गई थी।

 

 

 

 

लेकिन गांव के लोग तो उस गड़ेरिया और अन्य के जाने से जो पतली सी सड़क बनी थी उसी पर नई सड़क का निर्माण करने के लिए कह रहे थे जो कि एकदम दुर्गम और लंबा रास्ता था।

 

 

 

 

तब सड़क बनाने वाले इंजीनियर ने पूछा, “इस गांव से सबसे पहले शहर कौन गया था ?”

 

 

 

 

सभी लोग बोल उठे, “पहले एक गड़ेरिया गया था। उसके बाद एक धोबी अपना गधा लेकर गया था।”

 

 

 

 

इंजीनियर ने पूछा, “आप लोग क्या चाहते है, उस दुर्गम रास्ते की लकीर के फकीर बनेंगे या फिर जो सुगम रास्ता आपको आसानी से शहर तक पहुंचा देगा उसपर चलना चाहोगे, क्योंकि जो रास्ता इस गांव के नौजवान विजय ने चुना है वह एकदम सुगम है। उससे आप लोगो को शहर में जाने के लिए परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।”

 

 

 

 

गांव के सभी लोगो को इंजीनियर के द्वारा बताई हुई बात समझ में आ गई थी। सभी लोग उस रास्ते पर चलने के लिए तैयार थे जो विजय ने स्वयं बनाया था।

 

 

 

 

सभी लोग उस गड़ेरिया के बनाए हुए रास्ते के लकीर के फकीर न होने का निर्णय ले लिया था। अब सरकार के प्रयास से उस गांव में धीरे-धीरे सभी सुविधाए उपलब्ध होने लगी थी।

 

 

 

 

अब सभी लोग विजय का धन्यवाद कह रहे थे जिसके प्रयास से इतना सुगम रास्ता सुलभ हो सका था।

 

 

 

 

 

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