Inspiration Story in Hindi For Students / प्रभावकारी हिंदी कहानी

Inspiration Story in Hindi For Students / प्रभावकारी हिंदी कहानी

Inspiration Story in Hindi For Students इस पोस्ट में Inspiration Story in Hindi दी गयी है।  यह बहुत ही बढियाँ मोटिवेटेड हिंदी कहानी है।

 

 

 

Inspiration Story in Hindi For Students

 

 

 

 

 

प्रिंस नाम का एक लड़का था। उसने बहुत ऊंचा सपना देखा था। वह डाक्टर बनना चाहता था। लेकिन उसकी गरीबी उसमे बाधा डाल रही थी।

 

 

 

 

वह स्कूल से छूटने के बाद कापी और कलम घूम-घूमकर बेचता था। उसे दूसरो की सहायता करने में बहुत ही आनंद आता था। लेकिन उसके पास इतने ज्यादा पैसे नहीं थे कि वह बड़े पैमाने पर जरूरतमंद लोगो की सहायता कर सके।

 

 

 

 

प्रिंस थोड़े से पैसो में ही कमजोर लोगो की सहायता करता था। एक दिन एक लड़के के पैर में मोच आ गई थी। प्रिंस ने अपने हाथ से पानी गरम करके उस लड़के के पैर की सिकाई कर दिया।

 

 

 

 

 

लड़के का पैर ठीक हो गया। उसके बाद उसने एक बुढ़िया की मदद किया जो भूखी थी। वह बुढ़िया भी प्रिंस को आशीर्वाद देकर चली गई।

 

 

 

 

एक दिन प्रिंस सुबह से ही कापी और कलम बेचने निकला था क्योंकि उसके स्कूल की छुट्टी थी। प्रिंस ने सोचा कि आज सुबह से कापी और कलम बेचूंगा तो शायद ज्यादा पैसे मिल जाएंगे।

 

 

 

 

लेकिन नसीब के आगे हर इंसान बेबस हो जाता है। उस दिन प्रिंस की कोई भी कापी कलम नहीं बिक पाई। प्रिंस थककर चूर हो गया था।

 

 

 

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उसने एक घर का दरवाजा खटखटाया सोचा शायद यहां कुछ कापी कलम बिक जाएगा। दरवाजा एक लड़की ने खोला, प्रिंस ने पूछा, “आपको कापी और कलम चाहिए क्या ?”

 

 

 

 

लड़की ने कहा, “नहीं।”

 

 

 

तब प्रिंस जाने लगा तो वह लड़की बोली, “आप घर के अंदर आओ। आप दूसरो की सहायता करते है तो मैं क्या आपको एक ग्लास पानी भी नहीं पिला सकती।”

 

 

 

 

प्रिंस घर के अंदर एक कमरे में बैठ गया। तभी लड़की एक ग्लास में दूध भरकर लाई और उसे प्रिंस को दे दिया। आज प्रिंस ने सुबह से ही कुछ नहीं खाया था। वह दूध का पूरा ग्लास खाली कर दिया था।

 

 

 

 

Inspiration Story in Hindi For Students

 

 

 

 

अब प्रिंस जाने लगा तब उस लड़की ने कहा, “याद रखो जो दूसरो की की मदद करता है भगवान उसके लिए खुद रास्ता बना देते है।”

 

 

 

 

समय बीतता गया। जिस लड़की ने प्रिंस को दूध का ग्लास दिया था, उसका नाम किरन था। अचानक एक दिन किरन की तबीयत बहुत खराब हो गई थी।

 

 

 

 

किरन के पिता ने शहर के सबसे मंहगे अस्पताल में दवा करवाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। सभी डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे।

 

 

 

 

प्रिंस पढ़-लिखकर अपना खुद का अस्पताल चला रहा था। उसे पता चला कि शहर के सबसे बड़े अस्पताल में किरन नाम की एक मरीज है।

 

 

 

 

सभी डाक्टर इलाज करके हार गए। वह शहर के बड़े अस्पताल में जाकर किरन नाम की मरीज को अपने अस्पताल में उठा लाया और उसका अच्छे से इलाज किया।

 

 

 

 

अब किरन पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गई थी। किरन के पिता ने अस्पताल का बिल जमा करना चाहा तो स्वयं डा. प्रिंस ने उन्हें एक कार्ड पकड़ा दिया।

 

 

 

 

जिस पर ‘पैड’ लिखा हुआ था और पीछे लिखा हुआ था, एक ग्लास दूध का कर्ज। किरन ने उस कार्ड को देखा और पढ़ा तभी डा. प्रिंस ने आकर कहा, “जो दूसरो की भलाई करते है भगवान उनके लिए खुद रास्ता बना देते है।

 

 

 

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2-  कुम्हार जब बर्तन बनाता है तब उसे एक लकड़ी की थपकी से थाप देकर उसके अंदर के कंकड़ पत्थर और तिनके का टुकड़ा इत्यादि निकालकर बाहर करता है और उसके बाद ही उस बर्तन का स्वरूप निर्धारित होता है। फिर कुम्हार उस बर्तन को पकाने के लिए एक बड़ी भट्ठी में डाल देता है। इस प्रक्रिया में बर्तन में प्रयुक्त होने वाली मिट्टी को असहय कष्ट का सामना करना पड़ता है। तब जाकर वह मिट्टी एक खूबसूरत बर्तन या खिलौना या मूर्ति का रूप ग्रहण कर पाती है।

 

 

 

 

 

 

उसी तरह मनुष्य का जीवन भी होता है। आपने अक्सर देखा होगा या सुना होगा प्रत्येक मनुष्य जो जीवन की बुलंदियों पर आसीन होता है। उस आदमी को जीवन में मिट्टी की तरह अनेक थपेड़ो का सामना करना पड़ता है। तब ही वह व्यक्ति एक सफल व्यक्ति बनकर सबके सामने आता है और सभी लोग उसका अनुसरण करने को तैयार रहते है।

 

 

 

 

 

हरिनाथ एक अमीर बाप का लड़का था। सुरेश एक मध्यम वर्गीय पिता का लड़का था। दोनों का एक साथ ही इग्लिश मीडियम स्कूल में नाम लिखवा दिया गया था।

 

 

 

 

एक दिन स्कूल के मास्टर ने कुछ सवाल पूछे थे। लेकिन हरिनाथ ने गलत उत्तर दिया और सुरेश ने भी गलत उत्तर दिया था। स्कूल के मास्टर ने दोनों छात्रों को पीट दिया।

 

 

 

 

जिसके कारण सुरेश और हरीनाथ को हल्की-हल्की घाव लग गई थी। दूसरे दिन हरिनाथ के बाप का फोन स्कूल के हेडमास्टर के पास आ गया था।

 

 

 

 

हेडमास्टर ने मास्टर को बुलाकर डांट लगाई और कहा, “अगर आप इस तरह से बच्चो को पढ़ाएंगे तो हमारे स्कूल में एक भी छात्र नहीं आएगा पढ़ने के लिए।”

 

 

 

 

मास्टर ने सफाई पेस करना चाहा तो हेडमास्टर ने कुछ नहीं सुना और चेतावनी देकर छोड़ दिया था। उधर सुरेश अपनी माँ को घाव दिखा रहा था जो मास्टर की मार खाने के कारण हो गई थी।

 

 

 

 

सुरेश अपनी माँ से कह रहा था। मैं उस स्कूल में पढ़ने नहीं जाऊंगा। लेकिन सुरेश के पिता ने और माता ने उसे समझाकर स्कूल भेज दिया।

 

 

 

 

सुरेश अपने क्लास में पहुंचा तब मास्टर उसपर अधिक ध्यान देते थे क्योंकि सुरेश मार खाने के बाद भी उसके घर से कोई उलाहना नहीं आया था।

 

 

 

 

बल्कि सुरेश के अंदर पढ़ने की इच्छा प्रबल हो गई थी क्योंकि उसे समझ आ गया था कि पढ़ाई में ध्यान लगाने से ही मार खाने से बचा जा सकता है।

 

 

 

 

सुरेश को पढ़ने की प्रबल धारणा को देखकर मास्टर भी उसे सब बच्चो की तरह ही पढ़ाते थे। लेकिन सुरेश की ग्रहण करने की क्षमता अन्य बच्चो से अधिक थी।

 

 

 

 

उधर हरिनाथ के घर से उलाहना आने के कारण ही कोई भी मास्टर उसके ऊपर ध्यान नहीं देता था। जबकि अन्य बच्चो की तरह उसे भी शिक्षा दी जाती थी।

 

 

 

 

लेकिन हरिनाथ को अपने घर से सपोर्ट मिलने के कारण ही वह पढ़ने में ध्यान नहीं देता था। फलतः वह उदंड हो गया था। समय व्यतीत होते देर नहीं लगी।

 

 

 

 

हरिनाथ अब हरी भाई यानी एक कुख्यात बदमाश बन गया था। जबकि सुरेश एक शहर का एक मजिस्ट्रेट बन गया था। जो अपने सटीक और तुरंत फैसला करने के लिए विख्यात हो गया था।

 

 

 

 

उसके न्यायालय में हर फैसले का उचित न्याय होता था। समय का चक्र घूमता गया। हरी भाई को किसी मामले में उस शहर के न्यायालय में पेश किया गया, जहां सुरेश न्यायाधीश था।

 

 

 

 

 

सुरेश तो हरी भाई को देखते ही पहचान गया था। सुरेश ने हरी भाई के केश का फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुरेश ने अपना भेष बदला और साधारण मनुष्य के रूप में हरी भाई से मिलने जेल में चला गया।

 

 

 

 

एक अजनबी को देखकर हरी ने पूछा, “कौन हो तुम ?”

 

 

 

 

सुरेश हरी भाई से कहने लगा, “मैं वही सुरेश हूँ, जो तुम्हारे साथ ही पढ़ता था। एक बार मास्टर ने हम दोनों को ही मारा था क्योंकि हम लोग मास्टर के द्वारा पूछे हुए प्रश्नो का उत्तर नहीं दे सके थे। तुम्हारे घर से हेडमास्टर के पास फोन आ गया था। जबकि मेरे मार खाने के बाद भी मेरे घर से कोई पूछने तक नहीं आया था कि हमारे बच्चे को क्यों मारा गया ? उसी का परिणाम है मैं मार खाने से बचने के लिए ही पढ़ाई में जी लगाकर जुट गया और तुम तो एक उडंद होकर आज इस हवालात में बंद हो जबकि मैं आज एक विख्यात न्यायाधीश बन गया हूँ और तुम्हारी केश भी हमारे समक्ष है। मैं तुमसे यहां मिलने के लिए चला आया हूँ इस आशा के साथ ही कि शायद तुम्हारे अंदर परिवर्तन आ जाए।”

 

 

 

 

 

 

हरी भाई ने सुरेश से कहा, “तुम अपना फैसला सही रूप से करने के लिए विख्यात हो उसमे दाग नहीं लगना चाहिए। मैं तुमसे वादा करता हूँ कि अपनी सजा पूरी करने के बाद अपने सारे बुरे कर्मो को त्यागकर एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश अवश्य करूंगा।”

 

 

 

 

तब तक जेलर ने आकर कहा, “मुलाकात का समय खत्म हो गया है।”

 

 

 

 

सुरेश बाहर निकला और चला गया। जेलर को पता भी नहीं लगा कि शहर का न्यायाधीश एक कुख्यात बदमाश से मिलने के लिए आया था।

 

 

 

 

तीसरे दिन न्यायालय में बहुत भीड़ थी। सुरेश ने हरी भाई को सबसे कठोर सजा सुनाई थी। लेकिन हरी भाई उस सजा को स्वीकार कर लिया क्योंकि उसे सुरेश से किया वादा याद था।

 

 

 

 

समय बीतने के साथ हरी भाई की सजा खत्म हो गई थी। एक साधारण मनुष्य के रूप में सुरेश खुद हरिनाथ को लेने के लिए आया था।

 

 

 

 

एक दिन हरिनाथ को साथ लेकर सुरेश उस स्कूल में गया जहां से उसने पढ़ने की शरुवात की थी। एक न्यायाधीश की गाड़ी और साथ सुरक्षा के लिए गार्ड देखकर स्कूल का पूरा स्टाप हड़बड़ा गया था।

 

 

 

 

सभी ने सोचा क्या बात हो गई जो न्यायाधीश महोदय को यहां आना पड़ा है। सब लोग एकदम हाई अलर्ट हो गए थे। लेकिन सुरेश की निगाहे तो उस मास्टर को ढूंढ रही थी जिसने उसे पढ़ाई के प्रथम चरण मे ही मार खिलाया था।

 

 

 

 

वह मास्टर तो हेडमास्टर के पीछे ही खड़ा था। सुरेश आगे बढ़कर उस मास्टर की चरण रज अपने माथे से लगा रहा था। हरिनाथ सुरेश के पीछे सिर झुकाए हुए खड़ा था।

 

 

 

 

यह दृश्य देखकर सभी भावुक हो उठे थे। जरा सोचिए क्या दृश्य रहा होगा उस समय। यह तो वैसा ही था जब भृगु महाराज ने श्री हरि के वक्षस्थल पर अपने पैरो से प्रहार किया था तो श्री हरि ने उनके पांव पकड़ लिए थे और पूछा हे मुनिवर आपके पैरो को कष्ट तो नहीं हुआ।

 

 

 

 

अब सुरेश सभी मास्टरों और बच्चो के सामने ही कह रहा था, “कि मैं इन्ही मास्टर के हाथ से मार खाकर आज इतना सफल होकर आपके सामने एक न्यायाधीश के रूप में खड़ा हूँ और दूसरी तरफ यह हरिनाथ भाई है जो मार खाने से बचने के लिए ना जाने कितनी बार पुलिस प्रशासन की मार खा चुके है।”

 

 

 

 

 

सुरेश सभी बच्चो को सम्बोधित करते हुए कह रहा था अगर आप लोग एक बार मार खाकर अपनी पढ़ाई में लग जाओगे तो हमारी तरह ही सफल हो जाओगे। अगर मार खाने से बचोगे तो जिंदगी में हमेशा ही मार खाना पड़ेगा।

 

 

 

 

इतना कहकर न्यायाधीश हरी भाई को साथ लेकर चला गया क्योंकि हरी भाई को भी सुधरने का मौका देना था।

 

 

 

 

 

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