Best Motivational Kahani in Hindi / जीवन को बदल देने वाली कहानियां

Best Motivational Kahani in Hindi / जीवन को बदल देने वाली कहानियां

Best Motivational Kahani in Hindi इस पोस्ट में Best Motivational short Kahani in Hindi की शिक्षाप्रद हिंदी कहानियां दी गयी हैं।  आप इसे जरूर पढ़ें।

 

 

 

 

 

Best Motivational Kahani in Hindi Pdf ( प्रेरक हिंदी कहानी ) 

 

 

 

 

 

success कोई आम का फल नहीं है जिसे खरीद लिया जाय, success कोई नींबू नहीं है जिसे निचोड़ लिया जाय, success कोई सुंदर वस्त्र नहीं है जिसे धारण हर लिया जाय। success तो वह दिव्य आभूषण है, जो कभी गन्दा नहीं होता। Success के शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर टिके रहना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि शिखर से गिरने के बाद उठना नामुमकिन तो नहीं मुश्किल जरूर होता है।

 

 

 

 

 

शुभम एक गरीब परिवार में पैदा हुआ था। उसके पिता के पास चार बकरियों के अलावा थोड़ी सी जमीन थी और वह सब कुछ था जिससे उनकी गरीबी का पहचान अच्छे से हो जाती थी।

 

 

 

 

प्रेरणादायक हिंदी कहानी 

 

 

 

 

 

बनवारी के घर जब शुभम का जन्म हुआ तो उन्होंने उसका नाम शुभम इसलिए रखा शायद उनके जीवन में कुछ शुभ कार्य हो जाय। शुभ कार्य तो नहीं हुआ लेकिन शुभम के आने से शुभ का एहसास जरूर हो रहा था।

 

 

 

 

 

शुभम का सुन्दर चेहरा चंचल बाल सुलभ अदाएं ठीक उसी तरह थी जैसे कमल कींचड़ में खिलने के बाद भी अपनी आभा से सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है।

 

 

 

 

 

शुभम तीन साल का हो गया था। जिस उम्र में बच्चों को खाने और खेलने से मतलब रहता है। उस उम्र में वह मिट्टी का टुकड़ा लेकर लिखने का प्रयास करता था। जिस तरह सोना मिट्टी में भी रहने पर भी चमकता है, उसी तरह उसका भविष्य चमक रहा था।

 

 

 

 

 

शुभम अब पांच वर्ष का हो चुका था। उसके पिता ने प्राइमरी स्कूल में नाम लिखवा दिया। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण उसे मास्टर की बताई हुई हर बात याद हो जाती थी। शुभम मास्टर की बताई हुई बातों को इस प्रकार ग्रहण करता जैसे चुम्बक लोहे को ग्रहण करता है।

 

 

 

 

 

 

समय बीतता गया शुभम के कुशाग्र बुद्धि की चर्चा बनवारी के कानों तक पहुंच चुकी थी। उसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार शुभम की शिक्षा का प्रयास किया लेकिन गरीबी यहां भी बनवारी का रास्ता रोक दिया।

 

 

 

 

 

शुभम ५वीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास किया था। उसे अब ऐसे द्रोणाचार्य की आवश्यकता थी जो अर्जुन की तरह तराश कर उसे महारथी बना सके।

 

 

 

Best Motivational Kahani in Hindi Writing

 

 

 

 

 

बनवारी लाल अपने पुत्र का नाम ६वीं कक्षा में लिखाने ले गए, लेकिन मास्टर ने बनवारी की गरीबी का उपहास उड़ाया और कहा कि आप दूसरे स्कूल में जाइये, यहां जगह नहीं बची है।

 

 

 

 

लेकिन बनवारी शुभम का नाम किसी दूसरे स्कूल में नहीं लिखवाना चाहते थे, क्योंकि उनके पास अन्य लोगों की तरह शुभम के लिए कोई आने-जाने की सुविधा और साधन नहीं थे और वर्तमान स्कूल नजदीक था, इसलिए आने जाने में कोई परेशानी नहीं थी।

 

 

 

 

 

बनवारी ने एक प्रयास और किया उन्होंने मास्टर को शुभम के शार्टिफिकेट का निरिक्षण करने के लिये कहा और शार्टिफिकेट मास्टर की तरफ देखने के लिये बढ़ा दिया।

 

 

 

 

अब चौकने की बारी मास्टर की थी, क्योंकि मास्टर की कक्षा में जितने भी छात्र थे, उनमें से किसी के नंबर शुभम के जितना तो क्या उसके आस-पास भी नहीं था। शुभम का ९८ % नंबर था। न चाहते हुए भी उन्हें शुभम का नाम लिखना पड़ा।

 

 

 

 

 

इस समय शुभम कक्षा ८ का छात्र था। पढ़ने में तेज तर्रार लेकिन बोलने में मौनी बाबा की तरह। उसके दिमाग में हमेशा पढ़ाई के विषय में मंथन चलता रहता था।

 

 

 

 

एक बार क्लास चल रही थी अध्यापक ने सभी बच्चों से पूछा, “आप लोग बताइये प्रयागराज किस स्टेशन का नाम है। दूसरा प्रश्न- कौन से स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया है ?”

 

 

 

 

 

 

उन्होंने कहा, ” जिसको उत्तर मालूम है वह हाथ ऊपर करे। “, क्लास में सन्नाटा था सभी की साँस लेने की आवाज स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था।

 

 

 

 

पूरे क्लास में सिर्फ शुभम का ही हाथ ऊपर उठा हुआ था जो मास्टर के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। मास्टर ने शुभम से उत्तर पूछा।

 

 

 

 

 

शुभम ने उत्तर दिया, “सर, पहले प्रश्न का उत्तर है इलाहबाद स्टेशन का नाम बदलकर प्रयाग राज कर दिया गया है। और दूसरे प्रश्न का उत्तर मुगल सराय स्टेशन का नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय कर दिया गया है।

 

 

 

 

 

दोनों प्रश्नो का सही उत्तर मिलने पर मास्टर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ताड़ लिया था उस विलक्षण प्रतिभा को जो अभी और चमकदार होनी थी। शुभम इस समय पूरे स्कूल में चर्चित हो चुका था।

 

 

 

 

 

उधर बनवारी की स्थिति में भी थोड़ा सुधार हुआ। पहले उनके पास चार बकरियां थी। इस समय बारह बकरियां हो चुकी थी।  आठ बकरियों की वृद्धि हो चुकी थी। अपना दायित्व पूरा करते हुए ही आठ बकरियों की बढ़ोत्तरी कर सके थे जो बनवारी लाल के लिए पर्वत तोड़ने से कम नहीं था।

 

 

 

 

 

शुभम अब १०वीं में था। उसने भी अन्य छात्रों के साथ ही जोरदार तैयारी की थी। सभी को अनुमान था कि शुभम ही बाजी जीतेगा क्योंकि होनहार वीरवान के ‘ होत चिकने पात ‘ जिसकी झलक शुभम कक्षा ६ से लेकर कक्षा ९ तक सभी को दिखला दी थी। १०वीं का परीक्षाफल आया जिसका सभी को इंतजार था।

 

 

 

 

जैसे किसान अपनी पकी हुई फसल को देखकर अनुमान लगा लेता है उसी तरह शुभम के विषय में लोगों का विश्वास था। लेकिन उसकी पराकाष्ठा का अनुमान किसी को नहीं था।

 

 

 

 

शुभम का रिजल्ट एक नंबर पर था। बनवारी लाल को अपनी बकरियों की ही चिंता थी और हो भी क्यों नहीं वही बकरियां ही उनकी जीविका का साधन मात्र थी।

 

 

 

 

 

अब शुभम के सामने अपनी आगे की शिक्षा पूर्ण करने की चुनौती थी, जिसका आर्थिक कारण था जो सुरसा के मुँह के सामान बहुत बड़ा था।

 

 

 

 

प्रकृति का नियम भी बहुत विचित्र होता है। कभी अर्जुन को उनके अभिभावक खुद द्रोणाचार्य के पास लेकर गए थे शिक्षा दिलाने। लेकिन आज स्वयं द्रोणाचार्य अर्जुन को ढूंढते हुए उसके घर पहुंचे थे।

 

 

 

 

शुभम कहीं गया हुआ था क्योंकि अब उसके पास समय ही समय था। उसको मालूम था कि पिता की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है जो उसे आगे तक पढ़ा सके, इसलिए यह घूमकर ही अपने बोझ को हल्का करने का प्रयास कर रहा था।

 

 

 

 

अपने घर एक अजनबी को आया हुआ देखकर शुभम हैरान था परेशान था क्योंकि वह गरीब था इसलिए लोग उसके दरवाजे पर आने से कतराते थे, क्योंकि उनकी झूठी इज्जत का स्वागत करने में बनवारी समर्थ नहीं थे।

 

 

 

 

 

शुभम के लिए यही बात परेशान करने वाली थी। अभिवादन के पश्चात् शुभम ने अपना परिचय दिया। उसे ज्ञात हो चुका था कि यह गौरव त्रिपाठी है जो उसके सामने बैठे है।

 

 

 

 

 

गौरव कोचिंग संस्थान के डायरेक्टर जिनके संस्थान में अनेकों छात्र- छात्राओं का स्वर्णिम भविष्य निर्माण होता था और जिले में उनके संस्थान की अनेकों शाखाए थी।

 

 

 

 

 

जरा सोचिए गौरव त्रिपाठी जैसा आदमी शुभम जैसे आदमी के घर आया हुआ था। यह सुभम के लिए किसी दिवा स्वप्न से कम नहीं था, शायद इसी को दिन मे स्वप्न देखने जैसा कहते है।

 

 

 

 

 

” क्या तुम हमारे संस्थान की शोभा बन सकते हो ? ” गौरव त्रिपाठी ने शुभम से पूछा। गौरव त्रिपाठी की बात सुनकर शुभम तो चौंक ही गया उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

 

 

 

 

 

शुभम ने कहा, “लेकिन सर हमारी स्थिति आपके तराजू पर खरी नहीं उत्तर पाएगी।” ” तुम सिर्फ हां कहो आगे का कार्य मैं स्वयं देख लूंगा। ” गौरव त्रिपाठी ने कहा।

 

 

 

 

 

शुभम की आगे पढ़ने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन  वह सब कुछ स्पष्ट कर लेना चाहता था। एक चालाक आदमी की तरह क्योंकि भावनाओं में बहकर पछताना पड़ता है।

 

 

 

 

 

गौरव  कोचिंग संस्थान का नियम था, प्रत्येक वर्ष १०वीं के बाद ऐसे छात्रों का चयन करना जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते थे और पढाई छोड़कर किसी कंपनी में मजदूरी करने पर विवश हो जाते थे।

 

 

 

 

 

इस तरह एक असाधारण प्रतिभा की मौत हो जाती थी। जिसे देश के उत्थान में में सहायक होना था, उस प्रतिभा को अपनी जीविका से जंग लड़नी पड़ती थी।

 

 

 

 

 

इसबार गौरव त्रिपाठी ने इस असाधारण प्रतिभा को निखारने का निश्चय किया था, जिसके फलस्वरूप द्रोणाचार्य स्वयं अर्जुन के सामने उपस्थित थे।

 

 

 

 

 

शुभम ने गौरव कोचिंग संस्थान का नाम तो खूब सुन रखा था।  उसे यह भी ज्ञात था कि गौरव त्रिपाठी ने ऐसे कई छात्रों को अपनी शाखाओं का जिम्मा दे रखा था, जो किसी के दबाव में रहकर कार्य नहीं करना चाहते थे, इसलिए ही गौरव कोचिंग संस्थान जिले के बाहर भी सफलता के झंडे लहराते है।

 

 

 

 

 

क्या सोच रहे हो शुभम ? गौरव त्रिपाठी ने फिर पूछा। इसबार शुभम ने हां बोल दिया। दूसरे दिन शुभम गौरव त्रिपाठी से मिला।  “तुम्हारे पढ़ने का पूरा खर्च गौरव कोचिंग संस्थान उठाएगा, लेकिन तुम्हे अपना शत प्रतिशत योगदान देना होगा जिससे इस संस्थान का गौरव और बढ़ जाए” गौरव त्रिपाठी ने शुभम से कहा। “मैं आपकी कसौटी पर खरा उतरने की कोशिस अवश्य ही करूंगा।” शुभम ने कहा।

 

 

 

 

 

 

शुभम अब १२वीं का छात्र था। सभी का मालूम था कि शुभम जिले में टॉप करेगा, लेकिन इसबार उसके कदम और भी आगे थे, वह प्रादेशिक स्तर पर प्रथम आया था।

 

 

 

 

गौरव त्रिपाठी बहुत गर्वित थे।  उन्हें अपने फैसले पर नाज हो रहा था । उन्होंने ही उस हीरे को तरासा था, उसकी चमक आज प्रदेश स्तर पर फैली हुई थी।

 

 

 

 

उसके बाद शुभम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। न जाने कितनी डिग्रियां शुभम के पास थी। बड़ी- बड़ी कंपनियों से बड़े-बड़े ऑफर आने लगे, लेकिन उसने सभी को ठुकरा दिया। कारण क्या था उसे अपनी पहचान बनाना था, न कि दूसरे की पहचान बनना।

 

 

 

 

 

शुभम की सफलता से गौरव त्रिपाठी बहुत ही खुश थे, क्योंकि शुभम ने उन्हें निराश नहीं किया था। “आगे क्या विचार है तुम्हारा” गौरव त्रिपाठी ने शुभम से पूछा।

 

 

 

 

 

“मैं अपने पिता के व्यापार को आगे बढ़ाना चाहता हूँ जिसमे हमारी पहचान छुपी है।” गौरव त्रिपाठी निराश हो गए थे और उनकी मनोकामना को शुभम ने भांप लिया था।

 

 

 

 

 

शुभम ने कहा, “मैं अपने जन्मदाता पिता के व्यवसाय को आगे बढ़ाऊंगा, जिससे अर्ध शिक्षित लोगों को अपनी जीविका के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और हमारा जिला स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ेगा, और मैं अपने पालनहार पिता के उद्देश्य को भी पूरा करूँगा, जिससे हमारा जिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहे।”

 

 

 

 

 

गौरव त्रिपाठी शुभम के सार गर्भित वाक्य को सुनकर प्रफुल्लित हो उठे। उनका प्रयास उन्हें सार्थक प्रतीत हुआ। आज शुभम अपने पिता के व्यापार को ( बनवारी जीविका आश्रम ) के नाम से आगे बढ़ा रहा है। जहां उन्नत किस्म की बकरियों की देखभाल की जाती है। उसमे सैकड़ों की संख्या में लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

 

 

 

 

 

अब प्रयास था पालनहार पिता के ऋण से मुक्त होना। गौरव कोचिंग संस्थान पहचान के लिए विख्यात था। उसे शुभम जैसे कुशल संचालक का साथ गौरव त्रिपाठी का प्रयास जनता के विश्वास का प्रतीक था। जिससे निकले हुए छात्र देश ही नहीं विदेश में भी सफलता अर्जित कर रहे थे।

 

 

 

 

 

Moral Of This Story – सफल होने के लिए मेहनत और प्रयास आवश्यक होता है।

 

 

 

 

एक से भले दो Best Motivational Kahani in Hindi Pdf

 

 

 

 

2- अगर कोई भी कहीं जा रहा है या सफर कर रहा है, तो उसे अपने साथ सफर करने वाले को उपेक्षित नहीं करना चाहिए, क्या पता हमें उसकी आवश्यकता पड़ जाय? 

 

 

 

 

अगर आपने उस साथी की उपेक्षा की तो वह आपको भरी पड़ सकती है और मुसीबत आने पर आपको उसका साथ नहीं मिलेगा। अगर अपने उससे सज्जनता दिखाई तो वह अवश्य ही आपकी Help कर सकता है। आज की Motivational Story इसी पर आधारित है।

 

 

 

 

 

मोहन अपनी आजीविका की खोज में शहर के लिए प्रस्थान किया। रास्ते में उसे एक नन्हा सा कछुआ मिला, जो घायल अवस्था में पड़ा था।

 

 

 

 

 

मोहन उसे उठाकर साफ किया, कछुए को थोड़ा आराम मिला। मोहन उसे अपने थैले में रख लिया और अपनी यात्रा को जारी रखा, चलते हुए उसे थकावट का एहसास हुआ।

 

 

 

 

 

उसे एक वृक्ष की छाया में विश्राम करना उचित लगा।  दोपहर का वक्त हो चुका था।  मोहन को भूख भी लग गई थी। उसने अपने साथ लाये हुए भोजन को खाया और भोजन का कुछ हिस्सा अपने उस नन्हे दोस्त को दिया तो उसने भी बड़े चाव से खाया। वृक्ष की ठंडी छाया में मोहन सो गया और उसका मित्र भी थैले में आराम करने लगा।

 

 

 

 

 

उसी वृक्ष के ऊपर सांप और एक कौवा रहते थे। सांप प्रत्येक समय जो भी उस वृक्ष के नीचे सोता था, उसे काट लेता था और कौवा उस आदमी की आंख निकाल कर खा जाता था। इस बार भी सांप ने अपनी क्रिया को दुहराया। कछुआ सांप को देखता ही रह गया और वह वृक्ष से ऊपर चला गया।

 

 

 

 

 

अब कौवे की बारी थी, लेकिन इसबार कछुआ सतर्क था। कौवा जैसे ही आंख निकालने के लिए उस व्यक्ति के मस्तक पर बैठा वैसे ही कछुए ने उसकी टांग को अपने मुंह में दबाकर अपने मुंह को अपनी खोल में सुरक्षित कर लिया।

 

 

 

 

 

अब तो कौवे की जान पर बन आई। कौवा बहुत फड़फड़ाया लेकिन सफल नहीं हो सका। उसने अपने मित्र सांप को आवाज दी और अपने प्राण बचने के लिए गिड़गिड़ाने लगा।

 

 

 

 

अपने मित्र की दशा देखकर सांप आग बबूला हो गया, फिर अपने फन से कछुए के ऊपर वार करने लगा, लेकिन कछुए के ऊपर इसका रंच मात्र भी असर नहीं हुआ। अब सांप भी कछुआ से विनती करने लगा कि हमारे मित्र को छोड़ दो, लेकिन कछुआ अपनी भूल को दुहराना नहीं चाहता था।

 

 

 

 

 

उसने सर्प से कहा, ” पहले तुम मेरे मित्र को ज़िंदा करो।  उसका विष वापस लो। उसके बाद ही मैं तुम्हारे मित्र को छोड़ सकता हूँ।  “

 

 

 

 

सर्प ने आदेश का पालन किया। कछुए का मित्र जिन्दा हो गया था। सर्प भी पेड़ पर चला गया।  उसके बाद कछुए ने कौवे को आजाद कर दिया। कछुए के कारण ही मोहन की जान बच गई।

 

 

 

 

Moral Of This Story – उपेक्षा नहीं सहयोग की भावना रखनी चाहिए।

 

 

 

 

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